सोशल मीडिया, सच या झूठ?

आज का दौर सोशल मीडिया का है। यह इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया दोनों से दो कदम आगे निकल चुका है। कई बार जब तक टीवी चैनलों या अख़बारों को किसी घटना की जानकारी मिलती है, तब तक वही खबर सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल चुकी होती है। लोग उस पर अपनी–अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया थोड़े समय में खबर दिखा भी देती है, जबकि प्रिंट मीडिया एक दिन बाद जानकारी दे पाती है। इसलिए यह भी एक सच है कि लोग अब इन मीडियाओ के नहीं बल्कि सोशल मीडिया के दीवाने हो चुके है, और ही भी क्यों न, खबरों के अलावा सोशल मीडिया मनोरंजन भी करा देता है।

लेकिन सोशल मीडिया की एक सबसे बड़ी समस्या यह है, कि यहाँ खबरें बिना किसी सत्यापन के पोस्ट कर दी जाती हैं—चाहे वह खबर पूरी तरह झूठ ही क्यों न हो। दुर्भाग्य की बात यह है कि लोग ऐसी झूठी या भ्रामक खबरों से भ्रमित भी होते हैं और उन्हें पसंद भी करते हैं। छोटे-छोटे रील और शॉर्ट वीडियो ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। किसी की व्यक्तिगत या सामाजिक छवि खराब हो जाए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; बिना सत्यता की पुष्टि किए हर बात ट्रेंड करने लगती है।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव में सोशल मीडिया पर झूठी खबरें सच की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से फैलती हैं, और इसकी सत्यता को समझ पाना थोड़ा जटिल हो जाता है। अभी हाल में एक ऐसी ही फेक न्यूज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही थी, जिसे #भारतीयविदेशमंत्रालय ने फर्जी करार दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि सोमालीलैंड के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आधिकारिक बातचीत की है और भारत सोमालीलैंड को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता देने की तैयारी कर रहा है। छोटी-मोटी अफवाहें हों तो शायद उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता है, लेकिन जब बात देश और राष्ट्रहित से जुड़ी हो, तो एक सवाल स्वतः मन में उठता है—क्या सोशल मीडिया वाकई भरोसेमंद है? क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया किसी भी खबर को प्रसारित या प्रकाशित करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करते हैं।

इसलिए मेरा मानना है कि सरकार को सोशल मीडिया को लेकर सख्त कानून बनाने की आवश्यकता है, जहाँ फेक खबरें फैलाने वालों के लिए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान हो। खासकर उन लोगों के लिए, जो बिना सत्यता जाने किसी भी खबर को पोस्ट करते हैं या दूसरों के साथ साझा करते हैं। यदि कोई व्यक्ति कोई खबर पोस्ट करता है और उसकी सत्यता सिद्ध नहीं कर पाता, तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सोशल मीडिया पर झूठी और भ्रामक खबरों पर लगाम लगाई जा सके।

इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि आम नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें। किसी भी खबर को लाइक, शेयर या फॉरवर्ड करने से पहले उसके स्रोत, तारीख और प्रामाणिकता की जांच करना हर सोशल मीडिया उपयोगकर्ता का नैतिक दायित्व होना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता तथा मीडिया जागरूकता से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि युवा वर्ग सच और झूठ के बीच फर्क करना सीख सके। जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक केवल कानून बनाकर फेक न्यूज की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

एक अंतिम बात, फेक न्यूज फैलाने वाले केवल ‘अनजाने लोग’ नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के कुछ ‘प्रभावशाली लोग’ होते है जो देश में झूठी खबरें फैला कर अपना पब्लिसिटी बढ़ाना चाहते हैं या सता हथियाना चाहता है। इसलिए बिना सत्यापन किसी भी खबर को पोस्ट करना या साझा करना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक प्रकार का सामाजिक अपराध हो। ऐसे लोगों के लिए कड़े कानूनी प्रावधान होने चाहिए—चाहे वह आम नागरिक हो या प्रभावशाली लोग। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि वे भ्रामक सामग्री पर तुरंत कार्रवाई करें। जब तक झूठ फैलाने वालों में कानून का भय नहीं होगा और जनता जागरूक होकर ऐसे कंटेंट का बहिष्कार नहीं करेगी, तब तक सोशल मीडिया पर सच की आवाज़ दबती रहेगी और अफवाहें राज करती रहेंगी।

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