भारतीय युवाओं को अपंग बनाता सोशल_मीडिया

लेखक- उमेश कुमार, राँची (लेखक जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता एवं समीक्षक हैं)

सच कहा जाए तो सोशल मीडिया मूल रूप से एक मनोरंजन का माध्यम है, न कि कैरियर निर्माण का प्लेटफॉर्म। लेकिन आज की नई पीढ़ी इसे कैरियर का विकल्प मान बैठी है। दिन–रात रील्स बनाना, पोस्ट डालना और लाइक्स–व्यूज़ के पीछे भागना अब एक आदत बन चुकी है। यह बात भी सच है कि कुछ रील क्रिएटर्स ने इससे पैसा कमाया है और प्रसिद्धि भी पाई है, लेकिन अपवाद को नियम मान लेना सबसे बड़ी भूल है। सोशल मीडिया कभी भी स्थायी और सुरक्षित कैरियर का माध्यम नहीं हो सकता—इस सच्चाई को समझना आज अत्यंत आवश्यक हो गया है।

एक और गंभीर तथ्य यह है कि भारत में प्रचलित लगभग सभी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विदेशी हैं। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), लिंक्डइन, मैसेंजर—सभी अमेरिका की कंपनियाँ हैं; टेलीग्राम रूस से जुड़ा है और टिकटॉक चीन का है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हमारा अपना कोई प्रभावशाली सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं है, जबकि देश का हर युवा किसी न किसी विदेशी प्लेटफॉर्म से जुड़ा हुआ है।

रील्स बनाकर राष्ट्र नहीं बनता

आज हम दिखावे, प्रचार और थोड़ी-सी कमाई के लिए अपनी निजी जिंदगी से लेकर सार्वजनिक गतिविधियों तक सब कुछ सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं। यह न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए खतरनाक है, बल्कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। इस पर यह आशंका भी निराधार नहीं लगती कि कहीं यह सब एक विदेशी ताकतों की सोची-समझी रणनीति तो नहीं—जिसका उद्देश्य भारतीय युवाओं को शिक्षा, शोध और नवाचार से दूर करना हो। क्योंकि आज हम यह देखकर भ्रम में पड़ रहे हैं कि कुछ पढ़े लिखे लोग जॉब छोड़कर सोशल मीडिया से पैसा कमा रहे हैं, तो कुछ लोग बिना पढ़े लिखे तो युवाओं को लग रहा है पढ़ना-लिखना जरूरी नहीं, सिर्फ पैसा जरूरी है। यह सोच अत्यंत खतरनाक है। रील्स बनाकर राष्ट्र नहीं बनता, राष्ट्र बनता है शिक्षा, विज्ञान और नई सोच से।

विडंबना यह है कि विदेशी लोग पढ़-लिखकर, रिसर्च करके ऐसे प्लेटफॉर्म बना रहे हैं और हम भारतीय उन्हीं प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट बनाने में लगे हैं। आज यदि कोई विदेशी शक्ति जानना चाहे कि भारत में कहां कितनी भीड़ है, कौन सा शहर कितना संवेदनशील है, कहां बेरोजगारी अधिक है—तो उसे किसी गुप्तचर की जरूरत नहीं। हम खुद हर समय, हर जगह की जानकारी सोशल मीडिया पर मुफ्त में उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि देश पर कोई खतरा आए, तो दुश्मन को लक्ष्य तय करने में तनिक भी समय नहीं लगेगा।

अब सवाल उठता है—सोशल मीडिया से होने वाली इस कमाई से आखिर कितने लोगों का घर सच में चल रहा है? और यह पैसा आता कहां से है? उत्तर स्पष्ट है—ये कंपनियाँ पहले हमसे ही विज्ञापनों और डेटा के जरिए अरबों रुपये कमाती हैं, फिर उसी में से कुछ हजार रुपये हमें देकर खुश कर देती हैं। असल मुनाफा विदेशी कंपनियाँ ले जाती हैं और हम भ्रम में जीते रहते हैं कि हम कमा रहे हैं। ध्यान से सोचें तो समझ आएगा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश से बढ़ी पूंजी बाहर जा रही है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है और हम कहते हैं कि डॉलर महंगा हो रहा है, रुपया कमजोर हो रहा है—इसके पीछे यह भी कारण हैं।

अब भी समय है जागने का, सोचने का और दिशा बदलने का। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम भी आर्थिक और बौद्धिक रूप से दूसरे देशों पर निर्भर होकर, नेपाल जैसी स्थिति पर चर्चा करने को मजबूर होंगे।

लेखक परिचय :- लेखक मूलत राँची के रहने वाले हैं, उनकी शिक्षा (सामाजिक कार्य) संत जेवियर कॉलेज रांची से हुई है। समसामयिक घटनाओं पर पकड़ रखते हैं एवं अपनी लेखन शैली से अपने विचार प्रस्तुत करते रहते हैं। उनके लेख समय-समय पर कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उमेश कुमार झारखंड के विभिन्न सुदूर हिस्सों में बच्चों के शिक्षा पर कार्य करते हैं। लेखक जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता एवं समीक्षक हैं.

Desclaimer: ये लेख लेखक के अपने विचार हैं!

11 responses to “भारतीय युवाओं को अपंग बनाता सोशल_मीडिया”

  1. विचारणीय विश्लेषण, हां ये कहना बिल्कुल सही है कि जितने भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म है अधिकांश विदेशी है , इसलिए इसका उपयोग की लत हमे वास्तविक जीवन से भी दूर कर रहा है फिर भी हमारा व्यक्तिगत विचार है कि इस लेख से प्रतीत कड़वी सच्चाई को समझकर या दूरदर्शी होकर आवश्यक निर्णय लेना चाहिए।

  2. सोशल मीडिया को लेकर हमें थोड़ा संतुलित और सतर्क रहने की ज़रूरत है।

  3. आपका कथन शत प्रतिशत सही है हमारे देश के भविष्य,हमारे बच्चे बचपन से ही बौद्धिक रूप से पीड़ित होते जा रहे प्रभावित होते जा रहे।यह हमारे देश की सिर्फ विडंबना है ओर कुछ नहीं।

  4. The author has highlighted the true facts of the present times. Our government, the Indian government and the foreign government have together planned to ruin the future of the present youth completely. It was said that if one person in a family gets a government job, then there is no problem for the next generation, but the way social media has taken root in the minds of the present youth, there is no hesitation in saying that just as earlier people used to say that if one person in a family gets a job, then there is no problem for the next seven generations, similarly, it can be said that the life of the seven generations of a youth whose mental state has become a slave of social media in this era of social media will be destroyed.

  5. लेखक ने वर्तमान समय के बिल्कुल सत्य बातों को उकेरा है हमारी सरकार भारत की सरकार और विदेशी सरकार दोनों ही मिल करके वर्तमान के युवाओं का भविष्य को पूरी तरह से चौपट करने की योजना बना रखी है यह कहा जाता था न कि, एक परिवार में एक व्यक्ति का अगर सरकारी नौकरी हो गया तो उसके साथ पीढ़ी तक को कोई दिक्कत नहीं होती है लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया अभी वर्तमान युवाओं के दिमाग में घर कर चुका है इससे यह बात कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिस तरह से पहले के लोग कहा करते थे कि एक घर में नौकरी हो गया तो सात पीढ़ी तक कोई दिक्कत नहीं है ठीक इस तरह से कह सकते हैं कि जीस युवा का मानसिक स्थिति इस सोशल मीडिया के दौर में सोशल मीडिया का गुलाम हो गया हो उसके सात पीढ़ी का जीवन नष्ट हो जाएगी।

  6. वास्तव में सोशल मीडिया का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए ताकि युवा वर्ग अपने लिए बेहतरीन मार्ग प्रशस्त कर सके युवाओं को मार्गदर्शन करने का आपका प्रयास बेहद ही सराहनीय है धन्यवाद इसी तरह भविष्य में भी प्रयास करते रहें धन्यवाद

  7. सोशल मीडिया,सामाजिक संपर्क और आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करते हैं,वहीं निजता और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव भी डालते हैं। इसलिए सोशल मीडिया का संतुलित और जिम्मेदारी से उपयोग करना आवश्यक है।

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