
अंश और अंशिका के गुम होने के तेरह दिन बाद दोनों बच्चों के मिलने की खबर राहत देने वाली है। इसके लिए पुलिस प्रशासन और सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को साधुवाद। लेकिन इस खुशी के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा है- राज्य की पूरी पुलिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को ढूंढने में पुलिस को इतनी देर क्यों लगी? क्या यह पुलिस की लापरवाही का नतीजा था या पुलिस के पास आधुनिक तकनीक और नेटवर्क की कमी है या फिर इसलिए कि अंश और अंशिका गरीब परिवार के बच्चे हैं?
ये सवाल इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि यह मामला सिर्फ अंश और अंशिका तक सीमित नहीं है। झारखंड आज मानव तस्करी और बाल तस्करी का बड़ा केंद्र बन चुका है। आए दिन बच्चों के गुमशुदा होने की खबरें आती हैं, लेकिन अधिकतर बच्चे पुलिस की डायरी में सिर्फ एक “मिसिंग केस” बनकर रह जाते हैं। पुलिस अक्सर इन मामलों में तत्परता नहीं दिखाती। उनका काम मानो सिर्फ रिपोर्ट दर्ज करना भर रह गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर साल 40,000 से अधिक बच्चों का अपहरण होता है। इसके मुख्य कारण यौन शोषण और मानव अंगों की तस्करी हैं। अगर पुलिस मिसिंग बच्चों की खोज में गंभीरता दिखाए और दोषियों को सख्त सजा दिलाए, तो शायद हजारों मासूम जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
दूसरा बड़ा पहलू यह है कि आज भी राज्य की पुलिस आधुनिक तकनीक से काफी पीछे है। जब अपराधी नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, तब पुलिस का पुराने तरीकों पर निर्भर रहना बेहद चिंताजनक है। कई थानों में आज भी कंप्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल रिकॉर्ड और आधुनिक संचार साधनों की भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों की तो बात ही छोड़िए, शहरों में भी पर्याप्त CCTV कैमरे नहीं हैं। जो संसाधन हैं, उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ भी नहीं है। इसका नतीजा यह होता है कि जांच की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और अपराधियों तक समय पर पहुंच पाना मुश्किल हो जाता है।
तीसरी चिंता की बात यह है कि पूरे राज्य में अभी केवल 42 थानों को ही “बाल मित्र थाना” बनाया गया है। जिस राज्य में 44.25% आबादी 0 से 18 वर्ष के बच्चों की है, वहाँ इतनी कम बाल मित्र थाने होना बेहद शर्मनाक है। इस व्यवस्था में अंश और अंशिका को सुरक्षित ढूँढ लाना भले ही बड़ी उपलब्धि लगे, लेकिन सच यह है कि इस सिस्टम को तुरंत सुधारने की सख्त जरूरत है। बाल मित्र थानों की संख्या राज्यभर में तेजी से बढ़ाई जानी चाहिए। साथ ही प्रत्येक थाने में पदस्थापित बाल कल्याण अधिकारी को बाल अधिकार, बाल मनोविज्ञान और संकटग्रस्त बच्चों से व्यवहार को लेकर विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके अलावा प्रशासन को NGO, CSO और अन्य हितधारकों के साथ निरंतर और मजबूत समन्वय बनाना होगा, ताकि किसी भी विपरीत परिस्थिति में प्रशासन, NGO, CSO और सभी हितधारक कंधे से कंधा मिलाकर काम कर सकें और बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने में वास्तविक सहयोग दे सकें।
अंत में, अब समय आ गया है कि पुलिस प्रशासन खुद को आधुनिक तकनीक से लैस करे और अपनी सोच भी बदले। पुलिस को ऐसा बनना होगा कि वह न केवल अपराध पर तेजी से काबू पा सके, बल्कि जनता का भरोसा भी जीत सके। जब लोगों को यह विश्वास होगा कि उनकी शिकायत पर तुरंत और सही कार्रवाई होगी, तभी कानून के प्रति सम्मान बढ़ेगा और अपराधियों के मन में डर पैदा होगा इसलिए राज्य सरकार को चाहिए कि वह पुलिस के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दे—ताकि भविष्य में कोई भी अंश और अंशिका तेरह दिन तक इंतज़ार न करे।
लेख_ उमेश कुमार
यह लेखक के निजी विचार हैं।

सटीक विश्लेषण, हम आपके इस विचार से पूर्णतः सहमत हैं…सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि पुलिस को जो कार्य और व्यवस्थाओं को व्यवस्थित के लिए जिम्मेदारी मिली है वो कार्य को अंजाम तक लाने के लिए धरने, पैरवी और आंदोलन की जरूरत पड़ जाती है, जो प्रशासनिक का जिम्मेदारी के प्रति अपेक्षित प्रतिबद्धता की उदासीनता को दर्शाता है।
सही कहा आपने, यह सरकार की उदासीन भावना के कारण पुलिस नहीं कुछ कर पाती है